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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 108

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 108 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 108

संस्कृत श्लोक

अनन्तविभवभ्रष्टा दौर्भाग्यपरितापिनी । शोचन्ती प्राप्य जीवत्वं भर्तृहीनेव नायिका ॥ १०८ ॥

हिन्दी अर्थ

असीम विभवा से भ्रष्ट हुई तथा दुभग्यरूप परिताप से परितप्त हुई यह चिति जीवरूपता प्राप्त कर ऐसे शोक विमग्न हो जाती है, जैसे पतिविहीना नायिका