Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

ब्रह्म ब्रह्मन्सदसतोर्मध्यं तद्देव उच्यते । परमात्मपराभिख्यं तत्सदोमित्युदाहृतम् ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

हे ब्रह्मन्‌, सत्‌ ओर असत्‌ के (भाव-अभाव, वर्तमान और उससे अन्य काल, मूर्त-अमूर्त, कार्यकारण अथवा व्यावहारिक एवं प्रातिभासिक पदार्थो के) मध्यभूत (अन्तरालवर्ती साक्षिचिन्मात्ररूप अथवा अधिष्ठानरूप होने से मध्यभूत) वह ब्रह्मचैतन्य ही देव कहा जाता हे । वही सूर्य, चन्द्र, अग्नि, करण एवं ज्योतियों की अपेक्षा बढ़े-चढ़े आत्मारूप सर्वावभासक रूपवाले प्रकाश से युक्त होता हुआ “ॐ पद से श्रुतियों में विराट आदि पादत्रयात्मक सम्पूर्ण प्रपंच के प्रविलापन द्वारा “शिवमद्वैतं चतुर्थ मन्यन्ते स आत्मा विज्ञेय:' यों व्यवहृत हुआ है