Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
स्थितं सर्वत्र सर्वं तु लतास्वन्तर्यथा रसः ।
सत्तासामान्यरूपेण महासत्तात्मनापि च ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
लताओं के अन्दर स्थित रस
की नाई वह सर्वात्मरूप देव व्यवहारकाल मेँ सर्वत्र अनुगत होने के कारण सत्तासामान्य स्थित हे ।
ओर सर्वबाधकाल में भी महासत्तारूप से स्थित हे