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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verses 17–18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verses 17–18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 17,18

संस्कृत श्लोक

यच्चित्तत्त्वमरुन्धत्या यच्चित्तत्त्वं तवानघ । यच्चित्तत्त्वं च पार्वत्या यच्चित्तत्त्वं गणेषु च ॥ १७ ॥ चित्तत्त्वं यन्ममेदं च चित्तत्त्वं यज्जगत्रये । तद्देव इति तत्त्वज्ञा विदुरुत्तमबुद्धयः ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

सभी देवता आदि की मुख्य आत्मा होने से वही मुख्य देव है, यों कहते हैं। हे पापशून्य मुने, अरुन्धती का जो चैतन्यस्वरूप है, तुम्हारा जो चैतन्यतत्त्व है, पार्वतीजी का जो चैतन्यस्वरूप है, उनके गणो मे जो चैतन्यात्मता है, जो मुझमें यह चैतन्यस्वरूप है ओर जो तीनों जगत में चैतन्यस्वरूप विराजमान है, उत्तममति तत्त्वज्ञ लोग उसे ही देवतारूप जानते हैँ