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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

न स दूरे स्थितो ब्रह्मन्न दुष्प्रापः स कस्यचित् । संस्थितः स सदा देहे सर्वत्रैव च खे तथा ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

हे ब्रह्मन्‌, वह न तो दूर ही स्थित है ओर न किसी के लिए दुष्प्राप्य ही है । वह सदा इसी शरीर तथा सम्पूर्ण आकाश में सर्वत्र ही स्थित हे