Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
चिदेवासु समग्रासु सर्वदैवैकिकैव हि ।
त्रैलोक्याम्भोधिसंस्थासु शरीरजलजालिका ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
इन संपूर्ण त्रैलोक्यरूपी समुद्रों के तात्त्विक स्वरूपोंका विचार करने पर अकेली चिति ही सदा उनके
वास्तविक स्वरूपभूत जल समूह के स्थान में स्थित है, न कि कोई दूसरी वस्तु