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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 34

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

शरीरपङ्कजभ्रान्तमनोभ्रमरसंभृताम् । आस्वादयति संकल्पमधुसत्तां चिदीश्वरी ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

भोक्ता के अविवेक से उसमें मानसिक संकल्प से जनित भोक्ता आदि त्रिपुटी का प्रकाशकत्व ही भोक्तृता है, ऐसी कल्पना की जाती है, इस आशय से कहते हैं। शरीररूपी कमल में भरमणशील मनरूप भ्रमर द्वारा संचित की गई संकल्परूपी मधुसत्ता का अपने में आरोपित समस्त पदार्थो के अवभासन में समर्थ चिति ही आस्वाद लेती हे