Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
बन्धचित्तमयाचारचारुचञ्चुरचक्रिकम् ।
संसारचक्रं चिच्चक्रे भ्राम्यति भ्रमभाजनम् ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
बन्धन में डालनेवाले
चित्तविकारात्मक (कर्तृत्व-भोक्तृत्वात्मक) आचार से सुन्दर एवं चपल व्यष्टि जीवों के संसरण-चक्रों
से युक्त जीव समष्टि संसाररूप चक्र, जो भ्रम का आश्रय हे, मायाशबल चक्र में घूमता रहता है