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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verses 37–38

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verses 37–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

चिच्चतुर्भुजरूपेण जघानासुरमण्डलम् । कालो जलदखण्डेन सायुधेन यथाऽऽतपम् ॥ ३७ ॥ चित्र्त्रिनेत्रतया ब्रह्मन्वृषशीतांशुचिह्नया । गौरीकमलिनीवक्रपद्मषट्पदतां गता ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

(८) इस विषय में भगवान श्री गौडपादाचार्यजी ने कहा है : भोगार्थ सुष्टिरित्येके क्रीडार्थमिति चाऽपरे । देवस्यैष स्वभावोऽयमाप्तकामस्य का स्पृहा ॥ कोई लोग भोगार्थ सृष्टि मानते हैं और कोई लोग क्रीडार्थं सृष्टि मानते हैं, परन्तु परब्रह्म परमात्मा की स्वभावभूतअविद्या का विलास ही यह सृष्टि है, क्योकि आप्तकाम परमात्मा को किसी प्रकार की इच्छा हो ही नहीं सकती । यदि शंका हो कि “सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय“ (परमात्मा ने इच्छा की कि प्रजारूप से मैं बहुत हो जाऊँ) इत्यादि श्रुति के साथ विरोध हो जायेगा, तो वह युक्त नहीं है, क्योकि अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः" इत्यादि अन्य श्रुतियों मेँ इच्छा, प्रयत्न आदि निरपेक्ष परमात्मा के निःश्वासरूप ही ऋग्वेद आदि हैं, ऐसा कथन है । तथा "तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय“ इत्यादि समान तात्पर्यवाली दूसरी श्रुति की अनुकूलता के लिए “सोऽकामयत” इस वचन का तात्पर्य एकमात्र अचेतनरूप प्रधान आदि में कर्तृत्व-शंका का निवारण करना ही है । इसीलिए भगवान बादरायण ने भी कहा है “कामाच्च नानुमानापेक्षा" (*सोऽकामयत“ इत्यादि श्रुतियों में ईश्वर ने इच्छा की, ऐसा कथन होने से सांख्यशास्त्रोक्त प्रधान आदि जगत के कारण नहीं हो सकते ।) कथित लक्षणवाले चिति के ही समस्त कर्तृत्व-भोक्तृत्व का विशेषरूप से वर्णन करते हैं । चिति ने ही आयुधो से परिपूर्ण चतुर्भुजरूप से समस्त असुर समूह का उस प्रकार विनाश कर दिया था, जिस प्रकार वर्षाऋतु इन्द्रधनुष से युक्त मेघ-खण्डरूप से धूप का विनाश कर देती है