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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

प्रबुद्धस्त्वं मुनिश्रेष्ठ तेनेदं तव कथ्यते । नातिदेवार्चने योग्यः पुष्पधूपचयो महान् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

हे मुनिश्रेष्ठ, चूकि तुम विवेकी यानी मुख्य अधिकारी हो, इसलिए मैं तुमसे कहता हू कि सबसे बड़े इस आत्मदेव की पूजा के लिए महान पुष्पों एवं धूपों का समूह योग्य नहीं हे