Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
अकृत्रिममनाद्यन्तमद्वितीयमखण्डितम् ।
अवहिःसाधनासाध्यं सुखं तस्मादवाप्यते ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वाभाविक, आदि-अन्त से
रहित, अद्वितीय, अखण्ड तथा बहुवित्तव्यय, आयास आदि बाहरी, साधनों से सिद्ध न होनेवाला नित्य
सुख उसी एकमात्र देव के अर्चन से प्राप्त होता है