Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
चिच्चन्द्रिका चतुर्दिक्षु अवभासं वितन्वती ।
विकासयति निःशेषभूतसत्ताकुमुद्वतीम् ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
साक्षात् भी चिति आनन्दप्रकाश में कारण है, यह कहते हैं।
चारों दिशाओं में प्रकाश का विस्तार कर रही चितिरूपी चन्द्रिका समस्त भूतसत्तारूपी कुमुदिनी
का विकास करती हे