Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
चिद्दर्पणमहालक्ष्मीस्त्रिजगत्प्रतिबिम्बितम् ।
गृह्णात्यनुग्रहेणान्तः स्वगर्भमिव गर्भिणी ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
चितिरूपी दर्पण की महालक्ष्मी (स्वच्छ प्रकाशस्वरूप शोभा या वैष्णवी
माया) अनुग्रहपूर्वक अपने ही भीतर उस प्रकार तीनों जगत का प्रतिबिम्ब धारण करती है, जिस प्रकार
गर्भिणी अपने भीतर अपना गर्भ धारण करती है