Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verses 47–51
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verses 47–51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 47-51
संस्कृत श्लोक
जीवजालरजःपुञ्जवासनारसरञ्जिता ।
संवेदनत्वग्वलिता चित्तेहाकलिकाकुला ॥ ४७ ॥
अतीतासंख्यत्रिजगत्केसरोज्ज्वलरूपिणी ।
अनारतस्पन्दमहाविलासोल्लासहासिनी ॥ ४८ ॥
सर्वर्तुपर्वपरुषा जडशैलादिगुल्मका ।
विग्रहग्रन्थिवलिता मूलाग्रपरिवर्तिता ॥ ४९ ॥
चिल्लतेयं विकसिता पेलवं सदसद्वपुः ।
विचित्रं दृश्यकुसुमं परामर्शासहं बहु ॥ ५० ॥
अनयेह हि सर्वत्र च्छायाच्छमिव जन्यते ।
मन्यते तन्यते वस्तु गीयते क्रियतेऽपि च ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
चिद्रूपी यह लता अनेकविध जीवों के समूहरूप
धूलि-पुंज मेँ वासनारूपी जल से सिचित है, उसके चारों ओर सविकल्प ज्ञानरूप छाल लगी है ।
चित्तवृत्तिरूप कलियों से वह भरी हे । अतीतकालीन असंख्य त्रिजगत रूपी केसरो से उसका स्वरूप
उज्ज्वल है । निरन्तर चंचल महाविलासों से जनित उल्लास ही उसका हास्य (विकास) है । समस्त
ऋतुरूपी पोरों से वह अत्यन्त कठिन है, जड़ पर्वत आदि ही उसमें गुल्म हें । जरायुज, अण्डज आदि
चतुर्विध शरीररूपी ग्रन्थियों से वेष्टित तथा प्रवृत्तिरूपी प्रतानों से यह आमूलजूड आवृत है इस
प्रकार की यह चितिरूपी लता विकसित होकर स्थित है, इसीके द्वारा-अत्यन्त कोमल, सत्असत्-
आकृति, अतएव वास्तव में युक्तियों से सिद्ध न हो सकनेवाले, चित्र-विचित्र तथा चन्द्रकान्त के
सदुश अत्यन्त विस्पष्ट से दृश्यरूप अनेक कुसुमों का-सर्वत्र उत्पादन, अभिमान और विस्तार किया
जाता हे । इसीसे वस्तु का कथन और निर्माण भी होता है