Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 52
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
महाचितानया नित्यं भासन्ते भास्करादयः ।
देहाः स्वदन्ते च मिथस्तत्सच्चिज्जडविभ्रमैः ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
इसी महाचैतन्य से सूर्य आदि
सदा प्रकाशित होते हैं और उसी चिति के स्वरूपभूत सत्य, प्रकाश तथा शरीरादि जड़-पदार्थों के
अविवेक से जनित भोक्तृ-भोग्यतारूप विश्रमों से दम्पती के शरीर, वास्तव में अमंगलरूप होने पर
भी, एक दूसरे के प्रीतिभाजन होते हैं