Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 56
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 56
संस्कृत श्लोक
चिद्रसायनसेकेन पदार्थपटलावली ।
रूपमेति फलं चैव प्रावृट्सिक्तेव सल्लता ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
चितिरूपी अमृत के सिंचन से यह पदार्थ-समूहों की
पंक्ति ही उस प्रकार रूप और फल धारण करती है, जिस प्रकार वृष्टि से सिंचित उत्तम लता फल
धारण करती हे