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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 57

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 57

संस्कृत श्लोक

चिच्छाययैव सर्वस्य जाड्यं सम्यगुदेति च । सर्वस्यास्य शरीरस्य गृहस्येव तमस्त्विह ॥ ५७ ॥

हिन्दी अर्थ

शंका हो कि यदि विति ही अमृत की नाई पदार्थ-समूहों के चारों ओर व्याप्त होकर स्फुरित होती है तो उनमें जडता नहीं होगी, क्योकि चारों ओर रस से आर्द्र होने पर शुष्कता की प्रसक्ति हो ही नहीं सकती ? तो इस पर कहते है। चिति की छाया से ही इन सम्पूर्ण शरीरो के अन्दर जडता का ऐसे भलीर्भाति उदय होता है, जैसे समस्त घरों के अन्दर प्रकाश-छाया से अन्धकार का भली प्रकार उदय होता हे । (तात्पर्य यह है कि पचीकरण-प्रकिया के अनुसार यद्यपि घर भी चारों ओर तेज से व्याप्त है, क्योकि उसमें तेज का भी संमिश्रण हआ है, इससे उसके भीतर अन्धकार की स्थिति हो नहीं सकती; तथापि तेज की जो प्रकाशरूपता है उसके पंचीकरण में संमिलित अन्यान्य पृथ्वी आदि भूतखण्डों से तिरस्कृत होने के कारण बाह्य प्रदेश में अभिव्यक्त सूर्य-प्रकाश की व्याप्ति-दशा मेँ तज्जनित छाया से भीतर उसका जिस प्रकार आविभावि होता है, उसी प्रकार घटादि के अधिष्ठानभूत चैतन्य की प्रकाशरूपता के भी अध्यस्त पदार्थ से अभिभूत होने के कारण बाह्य प्रदेश चाश्चुषवृत्ति आदि के द्वारा अभिव्यक्त हुई विद्व्याप्ति के स्फुरण-काल में उससे जनित छाया से जडता का भीतर उदय होता है)