Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
चिच्चमत्कृतयो देहे न भवेयुरिमा यदि ।
त्रैलोक्यदेहास्त्यक्त्वैते न स्पृशेयुः किलाकृतिम् ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
इस परिस्थिति में जैसे सूर्य आदि के प्रकाश से ही घर, महल आदि चित्रविचित्र आकृतियों की
सिद्धि होती है, वैसे ही देह के अन्दर अभिव्यक्त प्रमातृचैतन्य के चमत्कार से ही गाय, घोडा, घडा,
कपड़ा आदि चित्र-विचित्र आकृतियो की सिद्धि होती है, दूसरे प्रकार से नहीं, ऐसा कहते है ।
यदि देह में ये चैतन्य के चमत्कार न रहेंगे तो तीनों लोकों मेँ रहनेवाले साकार पदार्थ छाया और
जडता का त्यागकर दूसरे किसी भी प्रकार की आकृति का स्पर्श न करेगे, क्योकि छाया ओर जडता का
परित्यागकर आकृतिसाधक दूसरा कोई पदार्थ नहीं है, यह भाव है