Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 62
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 62 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 62
संस्कृत श्लोक
वर्धते विलुठत्यत्ति चिच्चराचरकारिणी ।
चिदेवास्तीतरन्नास्ति चिन्मात्रमिदमुत्थितम् ॥ ६२ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसी स्थिति में जैसे जल के अधीन तरंग आदि समस्त भावपदार्थ परमार्थतः जलस्वरूप ही होते
हैं, वैसे ही चैतन्य के अधीन जन्म, वृद्धि आदि समस्त भावस्वरूप जगत परमार्थतः वैतन्यमात्रस्वरूप
ही है, यो उपसंहार करते है।
यह चिति बढती है, लुढकती है ओर भक्षण करती है । चराचर पदार्थो का निर्माण करनेवाली
भी यह चिति ही है, दूसरा नहीं । इसलिए एकमात्र चितिस्वरूप ही यह उत्पन्न जगत है