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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 65

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 65 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 65

संस्कृत श्लोक

अयं चित्वान्पुरा भूत्वा चिद्धीनः संप्रति स्थितः । इतीयं कल्पना लोके प्रत्यक्षानुभवा कथम् ॥ ६५ ॥

हिन्दी अर्थ

उसीका पुनः स्पष्टीकरण करते हैँ । ये देह आदि दुश्यभाव से पहले और जीवनदशा में चेतन होकर तदनन्तर दृश्य एवं मरण आदि दशा में चैतन्य से हीन रहते हैं यह प्रत्यक्ष अनुभवरूप कल्पना लोक में किस तरह होती है ? क्योकि चैतन्य के अविनाशिस्वभाव और अपरिणामी होने से उसमें किसी तरह की जडता हो ही नहीं सकती