Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 76
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 76 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 76
संस्कृत श्लोक
ततश्चित्तं मनोमोहो मायेति विहिताभिधा ।
जाड्यं निपुणमाश्रित्य संसारे जायते मुने ॥ ७६ ॥
हिन्दी अर्थ
हे मुने, तदनन्तर
वही चित्त, मन, मोह, माया इन संज्ञाओं का निर्माणकर निपुणता से जडता का आश्रय कर संसार में
उत्पन्न होती है