Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 90
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 90 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 90
संस्कृत श्लोक
जायते स्वर्गनगरे नागी पातालकोटरे ।
आसुरी दैत्यविवरे नरस्त्री वसुधातले ॥ ९० ॥
हिन्दी अर्थ
कर्मगति का विस्तार करते है ।
कर्मगतिवश कभी स्वर्ग-नगर में उत्पन्न होती है, कभी पाताल कुहर में नागिन हो जाती है, कभी
दैत्यों के विवरों मेँ आसुरी बन जाती है तो कभी इस पृथ्वी में मनुष्य स्त्री बन जाती है