Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 91
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 91 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 91
संस्कृत श्लोक
राक्षसी राक्षसाधारे वानरी वनकोटरे ।
सिंही गिरीन्द्रशिखरे किन्नरी कुलपर्वते ॥ ९१ ॥
हिन्दी अर्थ
राक्षसो के
आश्रयस्थान में राक्षसी बन जाती है, अरण्य के कोटर में वानरी बन जाती है, पर्वतराजो के शिखर में
सिंहिनी बन जाती है तो कभी कर्मवश हिमालय आदि कुलपर्वतों पर किन्नरी बन जाती है