Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 93
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 93 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 93
संस्कृत श्लोक
शेते नारायणोऽम्भोधौ ध्यानी ब्रह्मपुरेऽब्जजः ।
कान्तागतो हरः शैले स्वर्गे सुरवरो हरिः ॥ ९३ ॥
हिन्दी अर्थ
चिति ही नारायण होकर समुद्र में नींद लेती है, ब्रह्मा होकर ब्रह्मपुर में ध्यान
करती है, हिमालय पर्वत पर आधे अंग में कान्ता से संवलित महादेवजी का रूप धारणकर निवास
करती है ओर स्वर्ग में सुरश्रेष्ठ हरि का रूप धारणकर विराजती है (५)