Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 94
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 94 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 94
संस्कृत श्लोक
दिनं करोति तीक्ष्णांशुर्वर्षत्यम्बुधरो जलम् ।
करोति श्वसनं संवित्सपर्वतमहोदधिम् ॥ ९४ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, संवित् ही सूर्य
(४) “पदमेव हि तन्नित्यमनित्याः पदिनः स्मृताः“ (ब्रह्मपद ही नित्य है और दूसरे पदधारी
अनित्य हैं) इत्यादि शिवपुराण के वचनानुरोध से नारायण आदि का भी जीवगति में ही निरूपण इस
बनकर दिवस का निर्माण करती है, मेघ बनकर जल बरसाती है, वायु बनकर वायुव्यापार करती है एवं
पर्वत ओर महोदधि बनकर पर्वत ओर महोदधि का व्यापार करती है