Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 95
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 95 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 95
संस्कृत श्लोक
ऋतुचक्रं प्रवहति सहसा कालमण्डलम् ।
दिनरात्रितयोपैति तेजस्तिमिरतां क्रमात् ॥ ९५ ॥
हिन्दी अर्थ
संवित् ही ऋतुघटित
संवत्सर का चक्र घुमाती है, सहसा युग, मन्वन्तर आदि काल का निर्माण करती है एवं दिन और रात्रिरूप
से क्रमश: प्रकाश एवं अन्धकाररूप बन जाती है