Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 96
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 96 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 96
संस्कृत श्लोक
क्वचिद्बीजरसोल्लासात्क्वचित्पाषाणमौनिनी ।
क्वचिन्नदी रसवती क्वचित्कुमुदविस्तृतिः ॥ ९६ ॥
हिन्दी अर्थ
चिति ही कहीं यानी वृक्ष आदि में बीजरूप तथा
उसकी अंकुरता में हेतु रसात्मक उल्लास से परिपूर्ण हो जाती है, कहीं पाषारूपिणी होकर निश्चल
पत्थर बन जाती है, कहीं पर जलपूर्ण नदी हो जाती है और कहीं पर कुमुदरूप से फैल जाती है