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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 31, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

ईश्वर उवाच । चिनोत्यलीकमेवैवं सदुःखास्मीति भावनात् । चित्स्वप्नक्षीबतामोहपतिता संभ्रमे यथा ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

ईश्वर ने कहा : जिस प्रकार स्वाप्निक मदिरा-मद से जनित मोह में गिरी हुई मुग्धा स्त्री सम्भ्रमकाल में 'मै दुःखी हूँ,” इस भावना से मिथ्या ही दुःख बटोरा करती है, उसी प्रकार अज्ञान- कीचड़ में फँसी हुई यह चिति भी अज्ञानकाल में में दुःखी हूँ, इस भावना से पूर्ववर्णितमिथ्या ही जीवजगद्धाव बटोरा करती है

सर्ग सन्दर्भ

तीसवाँ सर्ग समाप्त इकतीसवाँ सर्ग जिससे मन, प्राण ओर इन्द्रियों के द्वारा बाहर और भीतर प्रकाश होता है, उस शुद्ध चिति का जीवरूपता आदि के निषेध से प्रदर्शन |