Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 31, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
अमृतापि मृतास्मीति विपर्यस्तमतिर्वधूः ।
यथा रोदित्यनष्टैव नष्टास्मीति तथैव चित् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस प्रकार विपरीत-मतियुक्त मुग्धा स्त्री मरी हुई न होने पर
भी मैं मर गई, नष्ट न हुई भी मैं नष्ट हो गई, यों भावना करती हुई रोती रहती है, उसी प्रकार यह
चिति भी मैं नष्ट हो गई, मे मर गई, यों भावना करती हुई झूठमूठ रोती रहती है