Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 31, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
अकारणं विपर्यस्ता मतिर्भ्रान्तमपि स्थिरम् ।
यथा जगत्पश्यतीदं तथाहंताभ्रमाच्चितिः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
विपरीत हुई
बुद्धि कुम्हार के घूमते हुए चाक को भी जिस प्रकार बिना निमित्त के ही स्थिर देखती है, ठीक उसी
प्रकार यह चिति भी अहन्ता के भ्रम से असत्य इस सम्पूर्ण संसार को बिना कारण ही सत्य देखती
है