Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 31, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
अद्वितीया दधानेदं विकारादिविवर्जितम् ।
नास्तमेति न चोदेति स्पन्दते नो न वर्धते ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
किरी तरह के विकार आदि के बिना इस जगत को धारण कर रही अद्वितीया यह चिति
न अस्त होती है, न उदित होती है, न स्पन्दित होती है ओर न बढ़ती ही है