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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 36

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 31, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 36

संस्कृत श्लोक

चित्प्रकाशात्मिका नित्या स्वात्मन्येवावसंस्थिता । इदमन्तर्जगद्धत्ते सन्निवेशं यथा शिला ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार कर्मन्द्रियों की प्रवृत्तियों में हेतुभूत संकल्पस्वरूप मनोवृत्ति, उसके मालिन्यके साक्षीरूप से भी आत्मचैतन्य ही स्थित है, ऐसा विवेक करना चाहिए, यों कहते हैं। कर्मेन्द्रियों की प्रवृत्ति मेँ तत्परता संकल्प से होती है, वह संकल्प मननजनित है, वह मनन चित्त की कलुषता के कारण होता है और उन सबका साक्षी आत्मरूपा चिति सर्वविध मलों से निर्मुक्त है ॥ ३ ५॥ ऐसी स्थिति में जब कि आन्तर और बाह्य समस्त द्वैतप्रकाश साक्षिचैतन्यमात्रस्वरूप ही है, तब सम्पूर्ण द्वैतप्रपंच उसी साक्षी चैतन्य में अध्यस्त है, यह अनायास फलित हुआ, यह कहते हैं। जिस प्रकार स्फटिक-शिला अपने भीतर अरण्य पर्वत, नदी आदि का प्रतिबिम्ब धारण करती है, उसी प्रकार अपने स्वरूप में ही स्थित प्रकाशस्वरूप नित्य चिति भी अपने भीतर यह जगत धारण करती है