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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verses 34–35

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 31, verses 34–35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

शब्दतन्मात्रश्रवणवातसङ्गान्मनो विना । सुषुप्तसदृशी संवित्परमा चिदुदाहृता ॥ ३४ ॥ क्रियोन्मुखत्वं संकल्पात्संकल्पो मननक्रमः । मननं चित्तकालुष्यमात्मा चिन्निर्मला भवेत् ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार स्पर्शन्द्रिय से होनेवाले त्रिपुटी-भानस्थल में भी त्वगिन्द्रिय ओर वायु दोनों जड़ एवं तुच्छ (स्वतः सत्तारफूर्तिशून्य) हैं, इसलिए चिति की सत्तास्फूर्ति के बल से ही त्वचा ओर पवन का सम्बन्ध होता है और वही सम्बन्ध स्पर्शेन्द्रिय-कल्पना का निमित्त होने से स्पर्श कहा जाता है । उसके द्वारा उससे सम्बद्ध शीत-उष्ण आदि द्रव्यों मे जो शीतादि आकार की मनोवृत्ति होती है, वह स्पर्शज्ञान कहा जाता है और स्पर्शज्ञान से युक्त विषयपर्यन्त जो त्रिपुटी का प्रकाश है, वह परा साक्षी चिति है ॥ ३ २॥ इसी प्रकार प्राणेन्द्रिय ओर गन्धरूप से विभक्त हुए गन्ध-तन्मात्रा का नासापुट में प्रवेश करनेवाले पवन द्वारा किया गया जो उनका सम्बन्ध है, वही गन्धाकार अन्तःकरणवृत्तियों का निमित्त होने से गन्ध- संवित्‌ कहलाती हे । गन्धाकार अन्तःकरण वृत्तियों की त्रिपुटियों का अन्तःकरण से शून्य (विविक्त) जो प्रकाशात्मक ज्ञान है, वह साक्षी चैतन्य ही है ॥ ३ ३॥ शब्दतन्मात्रा और श्रवणेन्द्रिय का व्यानवायु के संसर्ग से उत्पन्न मनोवृत्ति रूप शब्दसंवित्तियों मेँ मन का अंश छोड़कर सुषुप्ति के सदृश निर्विकार साक्षीरूपा जो संवित्ति है, वही परम चिति उदाहृत है | इसी प्रकार रसनेन्द्रियजनित त्रिपुटी के साक्षात्कारफल में भी साक्षी चैतन्य का पृथकृकरण कर अनुभव करना चाहिए