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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verses 31–33

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 31, verses 31–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

वातात्कनीनिकास्पन्दस्तद्दीप्तिर्दृष्टिरुच्यते । तद्बाह्यवति तद्रूपरूपबोधस्तु चित्परा ॥ ३१ ॥ त्वङ्मारुतौ जडौ तुच्छौ तत्सङ्गः स्पर्श उच्यते । मननं स्पर्शसंवित्तिस्तत्संवित्तिस्तु चित्परा ॥ ३२ ॥ गन्धतन्मात्रपवनसंबन्धो गन्धसंविदः । आसां तु मनसा हीनं वेदनं परमैव चित् ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

सामान्यरूप से कथित विषय का विशेषरूप से वश्च आदि इन्द्रियो मेँ विभागशः उपपादन कर रहे भगवान शंकरजी सर्वत्र चिति की ही फलरूपता वतलाते है । चिति-सन्निधि से प्रेरित हुए व्यानवायुरूप निमित्त से चक्षु की कनीनिकाओं मे स्पन्द होता हे । उसमें अवस्थित प्रकाश (तेजस इन्द्रिय) चक्षु कही जाती है । उस चक्षु के द्वारा, नाली के सदृश, बाहर की ओर प्राप्त कराये गये अन्तःकरण से व्याप्त घट आदि मे उसी के समान आकारवाले नील, पीत आदि रूप एवं उसकी (घट आदि की) आकृति का जो बोध होता है, वह परा चिति ही हे