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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 30

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 31, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

सत्तामात्रेण चित्तस्य बोधश्चित्तेन्द्रियादिषु । आलोकसत्तामात्रेण व्यवहारः क्रियास्विव ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

चित्तसाक्षी की केवलसत्ता से ही चित्त, इन्द्रिय आदि में ज्ञान ऐसे होता है, जैसे केवल आलोक-सत्ता से क्रियाओं मेँ व्यवहार होता है