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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 29

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 31, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 29

संस्कृत श्लोक

रूपादीनां तु सत्तैषा चित एवामलैव चित् । द्वित्वैकत्वे त्वबोधोत्थे बोधेन विलयं गते ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

रूप आदि विषयों की जो यह सत्ता है, वह चिति की ही हे । चिति स्वयं निर्मल ही हे । भेद ओर अभेदाध्यास तो एकमात्र अज्ञान से जनित हैं ओर वे ज्ञान से विलीन हो जाते हैं