Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 31, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
ईषत्स्पन्दादधो याति भृगुप्रान्तात्तरोः फलम् ।
यथा तथैष संवित्तेरधःपातो महानिव ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे थोड़े से स्पन्दन से यानी डण्ठल के वियोजक प्रच्युतिमात्र से पर्वत के तट प्रान्त-
प्रदेश में स्थित वृक्ष से फल नीचे गिरता है, वैसे ही अज्ञान के स्पन्दन से संवित्ति का यह जीवभाव भी
एक तरह का महान अधःपतन है