Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 31, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
यदा चित्त्वाच्चिनोत्यन्तरन्यतामसतीं तदा ।
अहंतामिव संप्राप्य नश्यतीवाप्यनाशिनी ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
चयनस्वभाव होने के कारण जव चिति अपने भीतर असत्-रूप भिन्नता का संचय करती
है, तब मानों अहन्ता प्राप्तकर स्वयं अविनश्वरस्वभाव होती हुई भी यह एक तरह से नष्ट हो जाती
है