Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 31, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
स्पन्दनं कर्म संसारे जरामरणपञ्जरम् ।
एवं प्रवर्तितं चक्रमिदमादिविभूतिजम् ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
सभी रथों का कर्म संसार में परिभ्रमण ही हे ।
जरा एवं मरणधर्मवाले देहरूपी पिंजडे से युक्त जीवरूपी पक्षी का यह दोलाचक्र इसी प्रकार घूमता
रहता है