Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 31, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
यत्प्रयाति वनं वात्या तदेव परिघूर्णते ।
मनस्याकाशसंलीने न प्राणः परिवेपति ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
इसी प्रकार मन भी प्राण-क्रिया का निमित्त है, यो व्यतिरेक सहचर के प्रदर्शन द्वारा कहते है।
मन के हृदय-आकाश में विलीन हो जाने पर प्राण-वायु उस प्रकार कम्पित नहीं होता, जिस
प्रकार तेज का अभाव हो जाने पर रूप प्रकाशित नहीं होता