Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 31, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
तेजस्यसत्तामायाते न रूपमिव राजते ।
प्राणे प्रशान्ते मरुति मनोन्तर्न मनागपि ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
इसी प्रकार प्राण के निरोध से भी मन का निरोध होता है, यह कहते हैं।
प्राण-वायु के भली प्रकार शान्त हो जाने पर मन भीतर उस प्रकार तनिक भी कम्पित नहीं होता,
जिस प्रकार आँधी के शान्त हो जाने पर धूलि