Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 31, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
वात्यायामुपशान्तायां रजो न परिकम्पते ।
यत्र प्राणो मरुद्याति मनस्तत्रैव तिष्ठति ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
इसीलिए मन का रथ प्राण है, यह कहा गया है, यों कहते हैं।
जहाँ पर प्राण-वायु जाता है, वहीं पर मन रहता है । ठीक ही है, जहाँ-जहाँ रथ गमन करता है,
वहीं सारथि भी रहता ही है