Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 31, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
यत्र यत्रानुसरति रथस्तत्रैव सारथिः ।
प्राणसंप्रेरितं चित्तं याति देशान्तरे क्षणात् ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस प्रकार क्षेपण -यन्त्र से (गोफन से) फेंका गया पाषाण तत्काल
देशान्तर मेँ चला जाता हे, उसी प्रकार प्राण के द्वारा प्रेरित हुआ चित्त उसी क्षण देशान्तर मे चला जाता
है । वहाँ प्राण का निरोध होने पर मन क्षीण हो जाता है