Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 49
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 31, verse 49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 49
संस्कृत श्लोक
क्षेपणोन्मुक्तपाषाण इव तत्रान्यथा क्षयि ।
यत्र पुष्पं तत्र गन्धो यत्राग्निस्तत्र सोष्णता ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
जहाँ पुष्प रहता है, वहाँ गन्ध रहती है;
जहाँ आग रहती हे, वहाँ उष्णता रहती हे; जहाँ समष्टि-व्यष्टि प्राण रहता है, वहाँ मन जाता हे एवं
जहाँ पर चन्द्र और चन्द्रांश मन रहता है, वहीं चाँदनी ओर मनोवृत्तियाँ रहती हैं