Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 31, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
यत्र प्राणो मरुद्याति यत्रेन्दुस्तत्र तच्छविः ।
संवित्तिः पवनस्पन्दान्नाडीसंस्पर्शनश्च सः ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
इसीलिए चाक्षुष आदि संवित्तियों में प्रत्येक संवित्ति के प्रतिवायु भी निमित्त है, यह मैंने पहले ही
बतला दिया था, इस आशय से कहते हैं।
संवित्ति वायु के स्पन्दन से होती है, उस वायु का समस्त अंगों में अन्नरस के प्रवेश के लिए सब
नाड़ियों के साथ स्पर्श होता है और चित्त एवं मन से युक्त लिंग शरीररूप प्राण कोटर में चिति का,
बिम्ब-प्रतिबिम्बभाव से द्विगुणीकरण द्वारा, जो विस्पष्ट रूप होता है, वह भी उसी वायु से होता है