Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 31, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 31, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
न दृश्यदर्शनद्रष्ट्ररूपं तैलमिवोपले ।
न कर्तृकर्मकरणं दृशीन्दाविव कृष्णता ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
चित्त के निषेध से ही विति में चक्ष आदि इन्द्रियप्रयुक्त दृश्य, दर्शन और द्रष्टारूप त्रिपुटी का निषेध
भी सिद्ध हो जाता है, यह कहते हैँ ।
जिस प्रकार पत्थर में तेल नहीं रहता, उसी प्रकार शुद्ध चिति में दृश्य, दर्शन ओर द्रष्टा का रूप
नहीं रहता । जैसे चन्द्रमा में कालिमा (कालापन) नहीं रहती, वैसे ही चिति में कर्ता, कर्म ओर करण
नहीं रहते