Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 32, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
उपजीव्यात्मनो रूपं परं स्फुरति वृत्तिषु ।
आलोकमुपजीव्येमं रूपश्रीर्दृश्यगा यथा ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मा में अध्यस्त होने के कारण आत्मसत्ता का ही आश्रय कर मानसिक वृत्तियों मे प्रतिबिम्बित
आत्मचैतन्य के बल से मनोरूप जीव-जगत स्फुरित (प्रकाशित) होता है, यह कहते हैं।
जैसे इस सूर्य आदि प्रकाश का आश्रय कर घटादि पदार्थो में स्थित रूप शोभा प्रस्फुरित होती है,
वैसे ही मन की वृत्तियों मे प्रतिफलित आत्मा की चैतन्यसत्ता का आश्रय कर यह जीव-जगत प्रस्फुरित
होता है