Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verses 2–3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 32, verses 2–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 2,3
संस्कृत श्लोक
प्राक्तनैस्तैर्निहन्त्येव स्वमनोमननेहितैः ।
कर्मव्रातैर्विचित्रेहैः परिपीवरतां गतैः ॥ २ ॥
मनस्तया गता शक्तिः सज्जडेवागता चितेः ।
सा स्फुरत्यनया ब्रह्मन्नुचिता शक्तिभूतया ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
एवं अपने मन से किये गये मननों से चेष्टित कायिक-वाचिक चेष्टारूप विहित-निषिद्ध कर्मसमूहात्मक
कारणवश पुर्यष्टकरूप मनोभाव से परिणत होती हुई वह अपने अधिष्ठानभूत चित्-सत्ता से चित् की
नाई और अपने स्वभाव के बल से जड़ की नाई यों मिश्र-भाव को प्राप्त होती है । तदनन्तर ज्ञान ओर
कर्म के व्यवहार योग्य होती हुई वह मायाशक्ति ही अपनी शक्तिभूत इस ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय आदि
इन्द्रिय प्रणालिका से द्रष्टा, दर्शन और दृश्य आदि नव तरह के संसाररूप में नाचती है, इससे और
दूसरा कुछ नहीं हे