Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 32, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
अस्याः प्रसादादिह सा चित्कलङ्कवती मुने ।
जगद्गन्धर्वनगरं करोति न करोति च ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे मुने, इसी मायाशक्ति के विचार एवं अविचारस्वरूप प्रसाद से इस संसार
में क्रमशः कलंकयुक्त होती हुई वह चिति जगतरूपी गन्धर्वनगर का निर्माण करती है और नहीं भी
करती है यानी अविचार से निर्माण करती हे और विचार से निर्माण नहीं भी करती