Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 32, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
चित्ताद्यसत्तया देहो मूकस्तिष्ठति कुड्यवत् ।
तत्सत्तया हि स्फुरति नभःसंप्रेरिताश्मवत् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
तब ब्रह्म-चिति के सान्निध्य से देह ही सबका निर्माण करेगा, चित्त आदि की कल्पना की क्या
आवश्यकता है ? इस पर कहते हैँ ।
चित्त, मन, बुद्धि ओर अहंकार के न रहने से यह देह दीवार की नाई जड होकर मूक रहती है ओर
उनके रहने से तो, आकाश में फेंके गये पत्थर की नाई, यह स्फुरित (व्यापारशील) होती है